सुप्रीम कोर्ट ने फिर से लागू किया 2012 का पुराना नियम, जानें इसमें क्या है

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सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी (UGC) के नए नियमों पर रोक लगाते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है. सुनवाई के दौरान अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि नए नियम ‘अस्पष्ट’ हैं और कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर स्पष्टता नहीं देते.

यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने जनवरी 2026 में अपने नए Equity in Higher Education Institutions Regulations जारी किए. इनका उद्देश्य था-कैंपसों में जाति-आधारित भेदभाव को खत्म करना और छात्रों, शिक्षकों और स्टाफ के लिए एक सुरक्षित व सम्मानजनक माहौल बनाना, लेकिन नियम जारी होते ही देशभर में एक सवाल तेजी से उठने लगा-क्या भेदभाव रोकने के लिए भारत में पहले से ही कानून, कोर्ट आदेश और संस्थागत सिस्टम मौजूद नहीं हैं?

इसका जवाब है-हां और यही वजह है कि इस बार विरोध सिर्फ छात्र राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शिक्षक, विशेषज्ञ, प्रशासन और कानूनी हलकों में भी फैल गया.

पहले से क्या कानून मौजूद हैं?
भारत के संविधान में भेदभाव पर पहले से ही सख्त प्रावधान मौजूद हैं. अनुच्छेद 14, 15 और 17 समानता का अधिकार देते हैं और जाति के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव को पूरी तरह प्रतिबंधित करते हैं. इसके अलावा SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, सेवा नियम, विश्वविद्यालयों की अपनी स्टैच्यूट्स तथा कई तरह की एंटी-रैगिंग, Equal Opportunity Cells, इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटियां और ऑनलाइन शिकायत पोर्टल पहले से चल रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट भी कैंपस भेदभाव और छात्र आत्महत्या जैसे मामलों में कई बार विश्वविद्यालयों को पारदर्शी और निष्पक्ष जांच करने के निर्देश दे चुका है.

ऐसे में बड़ा सवाल उठता है कि नया UGC नियम असल में बदलता क्या है? वरिष्ठ वकील अस्था अनुप चतुर्वेदी कहती हैं कि नए नियम कोई नया अधिकार नहीं देते. वे बस पुराने अधिकारों को लागू करवाने की शक्ति देते हैं. यानी जो पहले सलाह थी, अब वह पूरा नियम और बाध्यता बन गई है. विश्वविद्यालय चाहे सरकारी हों या निजी, अब इन नियमों का पालन करना अनिवार्य होगा.

नए नियमों में क्या था बदला?
नए ढांचे में सबसे बड़ा बदलाव यही है. अब हर संस्थान में Equal Opportunity Centre अनिवार्य होगा और उसके अंदर एक Equity Committee बनेगी, जिसे पहले की तुलना में कहीं अधिक शक्ति दी गई है. इसके साथ 24×7 शिकायत तंत्र, ऑनलाइन पोर्टल और सख्त टाइमलाइन को भी अनिवार्य किया गया है.जैसे शिकायत मिलते ही 24 घंटे में बैठक, 15 दिन में जांच रिपोर्ट और सात दिनों के भीतर कार्रवाई. इतना ही नहीं, यदि संस्थान नियम नहीं मानते, तो UGC फंडिंग रोक सकता है, मान्यता प्रभावित कर सकता है और नए कोर्स की मंज़ूरी भी रोक सकता है. यानी 2012 के ढीले-ढाले नियमों की जगह अब 2026 का ढांचा पूरी तरह लागू होने योग्य, दंड से जुड़ा और सख्त हो गया है.

तो नया UGC नियम क्या बदलता है? लेकिन विवाद यहीं से शुरू होता है. कई विशेषज्ञों और प्रशासकों का कहना है कि पुराने कानून पहले से काफी थे, UGC ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वे क्यों असफल हुए. नए नियमों में दुरुपयोग रोकने के लिए कोई स्पष्ट प्रक्रिया नहीं है-जैसे कि फर्जी शिकायत क्या मानी जाएगी, सबूत का मानक क्या होगा, अपील किस तरह होगी या जांच के दौरान आरोपी और शिकायतकर्ता दोनों को कैसे सुरक्षित रखा जाएगा. कठोर दंड के कारण संस्थान अनावश्यक सावधानी बरत सकते हैं, जिससे निष्पक्षता प्रभावित होने का डर है.

सुप्रीम कोर्ट की दो स्पष्ट बातें
सुप्रीम कोर्ट पहले से ही दो सिद्धांतों पर जोर देता आया है-जाति-आधारित अपमान पर जीरो टॉलरेंस और जांच में पूरी निष्पक्षता. आलोचकों के मुताबिक नए UGC नियम पहला सिद्धांत तो मजबूती से अपनाते हैं, लेकिन दूसरे सिद्धांत-यानी निष्पक्ष और स्पष्ट प्रक्रिया को लेकर पर्याप्त मार्गदर्शन नहीं देते. यही कारण है कि कई लोग मानते हैं कि अस्पष्ट प्रक्रियाओं के कारण आगे चलकर यह व्यवस्था विवाद भ्रम और कानूनी चुनौतियों को जन्म दे सकती है.

असल सवाल यही है कि भेदभाव मौजूद है, यह बात निर्विवाद है, लेकिन क्या नए UGC नियम मौजूदा कानूनों को मजबूत बनाएंगे या पहले से मौजूद ढांचे के ऊपर एक और परत जोड़कर चीजों को और उलझा देंगे? जब तक UGC यह साफ नहीं बताता कि पुरानी व्यवस्था क्यों विफल हुई और नया ढांचा किस तरह व्यावहारिक और संविधान-संगत है, तब तक विवाद खत्म होने की संभावना बहुत कम है. जिस सुधार के लिए ये नियम बनाए गए थे, अब वही खुद पारदर्शिता और स्पष्टता की मांग कर रहा है.

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