
इम्तियाज अली ने अपनी नेटफ्लिक्स फिल्म में न सिर्फ चमकीला की कहानी बताई है, बल्कि सोच को ये खाद भी उपलब्ध करवाई है कि ये कहानी जानना जरूरी क्यों है. इस तरह के ‘मास’ कलाकारों का होना जरूरी क्यों है. दिलजीत की एक्टिंग ने हमेशा लोगों का दिल जीता है मगर ‘चमकीला’को उनकी बेस्ट परफॉरमेंस कहना गलत नहीं होगा.
दुनिया के बेस्ट डायरेक्टर्स के फिल्ममेकिंग पर दिए बयानों को एक साथ निचोड़ा जाए तो सार ये निकलता है कि एक फिल्ममेकर को स्क्रिप्ट, एक्टर, कैमरा, सेट्स, म्यूजिक और बाकी सब कुछ, अपने बेस्ट लेवल पर तैयार कर लेना है और फिल्म लेकर बैठ जाना है.उसके बाद इंतजार करना होता है एक जादू होने का. ये जादू कभी घटता है, तो अक्सर नहीं भी घटता. मगर जब ये घटता है और स्क्रीन पर उतर आता है, तो कुछ ऐसा होता है जिसे लिखने या बताने से बेहतर है कि महसूस किया जाए. मुद्दे की बात ये है कि इम्तियाज अली की ‘चमकीला’ में ये जादू घट गया है.
‘जिस वजह से चमका वो, उस वजह से टपका’
भोजपुरी भाषी समाज से आने के नाते मैंने गानों में आर्ट में अश्लीलता की बहस खूब देखी है. अपनी मिट्टी से हजार किलोमीटर दूर मुझे बड़ा कर रहे मेरे पेरेंट्स में मैंने ये डर देखा है कि कहीं से मुझे अपने कल्चर के ‘वैसे’ गानों का एक्सेस न मिल जाए, जिसने भोजपुरी को ढेर सारे ‘लोकप्रिय’ गायक दिए हैं. जिनके नाम उस इलाके से बाहर भले ही शायद सबको न पता हों. मगर वो अपने सुनने वालों के लिए खुदा से कम नहीं हैं. इन पर शाश्वत आरोप रहा है कि ये ‘अश्लील’ हैं.
मगर वो औलाद ही क्या जिसने अपने पेरेंट्स को गच्चा नहीं दिया! भोजपुरी से तो बचा लिया गया, मगर मेरी पैदाइश के इलाके से मेरे हिस्से आई पंजाबी ने काफी कच्ची उम्र में ही एक गाना मेरे कानों में डाल दिया- ‘तेरी मां दी तलाशी लेनी, बापू साड्डा गुम हो गया.’ पंजाबी सिंगर ‘चमकीला’ से ये मेरा पहला इंट्रो था. पूरा नाम- अमर सिंह चमकीला. वो सिंगर जिसके बारे में, ‘चमकीला’ के एक गाने में उसके आलोचक कह रहे हैं- ‘गंदा सा बंदा है, सोशल दरिंदा है.’ ये आलोचना इतनी तगड़ी थी कि माना जाता है इसी की वजह से सिर्फ 27 साल की उम्र में उसकी हत्या कर दी गई.
एक हैरानी की बात है कि पंजाबी की शान कहे जाने वाले, लेजेंड सिंगर गुरदास मान भी 1980 के करीब ही उभर रहे थे, उसी समय चमकीला भी चमकना शुरू कर रहा था आज मान साहब कल्ट हैं, क्लासिक हैं और चमकीला की कहानी कहने वाला कोई नहीं. मैंने खुद गुरदास मान की लाइफ पर, उनके किस्सों पर काफी कुछ लिखा है. मगर हैरानी ये है कि मुझे भी कभी चमकीला की कहानी इस तरह जानने की इच्छा नहीं हुई.
शायद समाज की मशीनरी, चमकीला जैसे ‘अश्लील’ और ‘अनैतिक’ कलाकारों को इसी तरह आम याद्दाश्त से साफ कर देती है. इम्तियाज अली ने अपनी नेटफ्लिक्स फिल्म में न सिर्फ चमकीला की कहानी बताई है, बल्कि सोच को ये खाद भी उपलब्ध करवाई है कि ये कहानी जानना जरूरी क्यों है. इस तरह के ‘मास’ कलाकारों का होना जरूरी क्यों है. यहीं पर ‘चमकीला
