
पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के बाद आरएसएस से जुड़े संगठनों का कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में तेजी से विस्तार हो रहा है। एबीवीपी और अन्य शैक्षणिक संगठनों की बढ़ती सक्रियता ने राज्य की छात्र राजनीति में नया बदलाव ला दिया है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए बड़े बदलाव का असर अब राज्य के शैक्षणिक संस्थानों में भी साफ दिखाई देने लगा है। भाजपा की ऐतिहासिक जीत के कुछ ही हफ्तों बाद आरएसएस से जुड़े छात्र और शिक्षक संगठनों ने कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अपनी सक्रियता तेजी से बढ़ा दी है। कभी वामपंथ और तृणमूल कांग्रेस के प्रभाव वाले कैंपस अब धीरे-धीरे नए वैचारिक बदलाव की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं। उत्तर बंगाल के कॉलेज कैंटीन से लेकर कोलकाता के विश्वविद्यालय परिसरों तक माहौल बदलता दिख रहा है।
ABVP को मिल रहे लगातार सदस्यता अनुरोध
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी), जो लंबे समय तक बंगाल की छात्र राजनीति में सीमित प्रभाव रखती थी, अब तेजी से विस्तार कर रही है। संगठन का दावा है कि चुनाव से पहले उसकी मौजूदगी करीब 96 कॉलेजों तक थी, लेकिन अब यह आंकड़ा 400 के पार पहुंच चुका है। एबीवीपी नेताओं के अनुसार, बड़ी संख्या में छात्र संगठन से जुड़ने के लिए संपर्क कर रहे हैं। कई कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में नए यूनिट बनाने की तैयारी भी शुरू हो चुकी है।
WhatsApp ग्रुप और डिजिटल नेटवर्क से बढ़ रही पकड़
एबीवीपी फिलहाल सीधे कैंपस कमेटियां घोषित करने के बजाय छात्रों को जोड़ने के लिए व्हाट्सएप ग्रुप और डिजिटल नेटवर्क का सहारा ले रही है। संगठन पहले इच्छुक छात्रों की जांच और वैचारिक समझ को परख रहा है। सूत्रों के मुताबिक, हाल के दिनों में टीएमसी छात्र परिषद (टीएमसीपी और एसएफआई से जुड़े कई छात्र भी एबीवीपी के संपर्क में आए हैं।
शिक्षकों और कर्मचारियों में भी बढ़ा झुकाव
सिर्फ छात्र संगठन ही नहीं, बल्कि शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के बीच भी आरआरएस समर्थित संगठनों की सक्रियता बढ़ी है। भारतीय शिक्षण मंडल और अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (एबीआरएसएम) का दावा है कि उनकी सदस्यता में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हो रही है। एबीआरएसएम के पदाधिकारियों के अनुसार, राज्य के कई जिलों में अब शिक्षक और कर्मचारी बड़ी संख्या में संगठन से जुड़ना चाहते हैं।
कैंपस राजनीति में वैचारिक बदलाव की शुरुआत?
राजनीतिक जानकार इसे सिर्फ संगठनात्मक विस्तार नहीं बल्कि बंगाल की शिक्षा और छात्र राजनीति में बड़े वैचारिक बदलाव की शुरुआत मान रहे हैं। दशकों तक वामपंथी विचारधारा का गढ़ रहे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अब राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की राजनीति की चर्चा बढ़ने लगी है। आरएसएस से जुड़े रणनीतिकार लंबे समय से मानते रहे हैं कि बंगाल में स्थायी राजनीतिक प्रभाव के लिए शिक्षा संस्थानों में मजबूत पकड़ बनाना जरूरी है।
विपक्ष ने बताया अस्थायी असर
हालांकि विपक्षी दलों का कहना है कि यह बदलाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का तात्कालिक असर है और वर्षों से बने संस्थागत प्रभाव को इतनी जल्दी खत्म नहीं किया जा सकता। लेकिन कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कैंपस का माहौल पहले की तुलना में स्पष्ट रूप से बदल रहा है।
