नेहरू के संघर्षपूर्ण दिनों का प्रमाण है पंकज चतुर्वेदी की पुस्तक: शिव मोहन यादव (समीक्षक)

Shiv Mohan Yadav
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पुस्तक: ‘जवाहरलाल हाजिर हो’
समीक्षक: शिव मोहन यादव
लेखक: पंकज चतुर्वेदी
प्रकाशन: पेंगुइन रैंडम हाउस प्रा. लि., गुरुग्राम
पृष्ठ: 208
मूल्य: 299

जेल की सलाखों के पीछे पंडित नेहरू के 3259 दोनों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है पंकज चतुर्वेदी ने। ‘जवाहरलाल हाजिर हो’ पुस्तक की भूमिका के अंतर्गत अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे लिखते हैं- ‘‘हाल ही के वर्षों में पंडित नेहरू के विराट व्यक्तित्व को खंडित करके उनके विचारों पर हमले का क्रम तेज हुआ है, लेकिन ऐसे मामलों में जैसा कि होता है, अगर किसी महान व्यक्तित्व पर कीचड़ उछाला जाता है तो तथ्यों के साथ उसकी असलियत समाज के सामने रखने वाले विद्वान भी सामने आते हैं।’’
पेंगुइन स्वदेश से प्रकाशित इस पुस्तक में लिखा गया है कि यह कहानी उसे दौर में देश के चुनिंदा रईस परिवारों में से एक के इकलौते वारिस और लंदन में रहकर विद्यालय से विधि तक की पढ़ाई कर लौटे एक युवा की है। जब वह गांधी जी के संपर्क में आया तो शान शौकत की जिंदगी त्यागकर देश की आजादी के संकल्प को जीवन का लक्ष्य बना लिया। एक दौर ऐसा आया कि घर के सारे लोग जेल में और घर में केवल बच्चे थे। किस तरह नेहरू ने सन 1915 से 1947 तक लगातार संघर्ष में जेलों और अदालत को अपनी बात कहने का माध्यम बनाया। हमारी आजादी की यात्रा करवास और कानून के संकरे गलियारों से होते हुए हमारे संविधान तक पहुँची। यह पुस्तक महज अदालती कार्यवाही का दस्तावेज नहीं है, जवाहरलाल नेहरू की जेल यात्राओं के दौरान घटित महत्वपूर्ण घटनाओं और स्वतंत्रता संग्राम के अनगिनत अनाम सेनानियों के संघर्षों का दस्तावेज है।
इस पुस्तक को भूमिका और लेखक की बात के अलावा नौ अध्यायों में बाँटा गया है। पहले अध्याय से गुजरते हुए आप पिता-पुत्र के एक साथ जेल में होने के यथार्थ को जानेंगे। अगले अध्याय में उनका विद्रोही स्वभाव जानेंगे, कैसे उनको हथकड़ी लगी, कैसे उन्होंने जानबूझकर कानून तोड़े और कैसे जवाहरलाल राजद्रोही हो गए। इन सब के अलावा उन्होंने निडर और बेखौफ होकर ब्रितानी शासन से कहा था कि यह हुकूमत धूल में मिल जाएगी।
लेखक ने अपनी बात में स्पष्ट किया है कि दुनिया भले ही उनका जन्मस्थान ‘आनंद भवन’ इलाहाबाद को मानती हो, लेकिन हकीकत में जवाहरलाल का जन्म मीरगंज में हुआ था। 77, मीरगंज इलाके में किराए का एक मकान लेकर रहने वाले मोतीलाल नेहरू इलाहाबाद हाईकोर्ट में बैरिस्टर थे। उनके शुरुआती संघर्ष के दिन थे, तभी 14 नवंबर 1889 को जवाहरलाल का जन्म हुआ। पुस्तक की मुख्य सूचनाएँ तो उसके आगे हैं, जिसमें लेखक ने उनकी प्रत्येक जेल यात्रा का विवरण उदाहरण और प्रमाणों सहित प्रस्तुत किया है। लखनऊ करावास की वह कोठारी हो, जैतो की पुलिस हवालात हो, नाभा की जेल हो, बरेली और देहरादून की जेलें हों, चाहे अल्मोड़ा और गोरखपुर की कारावास कोठरियाँ, पुस्तक में उन सब के चित्र भी दिए गए हैं और महत्वपूर्ण सूचनाएँ भी।
लेखक ‘नेहरू की रिहाई और माफीनामा’ के तहत लिखते हैं- ‘‘इस बात को लेकर अकसर विवाद होते हैं कि नाभा में नेहरू को दो साल की सज़ा हुई और अचानक सज़ा के बाद उन्हें रहा कर दिया गया। यह आरोप लगते रहे कि नेहरू ने माफीनामा लिखा कि वे कभी नाभा नहीं आएँगे और इसी शर्त पर उन्हें रिहा किया गया। हालाँकि कोई भी पक्ष इसके कोई भी तथ्य नहीं दे पाया, लेकिन अकाली आंदोलन के बारे में एक प्रामाणिक किताब इस मसले पर कुछ कहती है।
सोहन जोशी ने अपनी पुस्तक ‘अकाली मोर्चियाँ दा इतिहास’ (पंजाबी) (अकाली मोर्चों का इतिहास, 1972) ने जैतो मोर्चा के अध्याय में नेहरू की गिरफ्तारी, मुकदमा और फिर नाभा जेल की रिहाई को शामिल किया है। नेहरू और अन्य दो कांग्रेसी नेताओं ए.टी. गिडवानी और के. संथानम को दूसरे मामलों में सजा सुनाए जाने और कैद की सजा सुनाए जाने के तुरंत बाद रिहा कर दिया गया था। जोश की किताब से पता चलता है कि अगर नेहरू ने अपनी रिहाई के लिए कोई माफीनामा दिया होता तो यह मुद्दा मई-जून 1924 में भी उठा था। उन्होंने इस मसले पर ‘अकाली ते परदेसी’ अखबार का उदाहरण भी दिया है।’’
वर्तमान में चर्चा का विषय बनी इस पुस्तक के माध्यम से आप जान पाएँगे कि जवाहरलाल के ऐसे नौ अपराध कौन-से थे, जिनके कारण ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें सज़ाएँ सुनाईं और जेल में बंद रखा। क्या जेल जीवन उतना सरल था? लेखक ने उनके कई सत्याग्रहों, अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन में सक्रिय भूमिकाओं, ब्रिटिश हुकूमत के नियमों के विरुद्ध खड़े होने के प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। कुछ चर्चित हस्तियों के पत्र भी हैं, जिन्हें पुस्तक में छापा गया है। जवाहरलाल नेहरू को सन 1930 के सत्याग्रह में 6 माह की सजा हुई थी, तब महात्मा गांधी ने पंडित मोतीलाल नेहरू को पत्र लिखा था- ‘‘जवाहर ने अत्यधिक परिश्रम किया है, उसे 6 महीने के विश्राम की जरूरत थी।’’ इसके अलावा अनेक स्वतंत्रता सेनानियों के प्रसंग भी जुड़े हैं।
– शिव मोहन यादव
(लेखक एनसीईआरटी में सहायक संपादक हैं।)

 

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