
भारतीय महिला टीम का टी20 विश्व कप अभियान कई कमजोरियों की वजह से खत्म हुआ। बल्लेबाजी रणनीति, तेज गेंदबाजी की नाकामी, खराब फील्डिंग, गलत टीम संयोजन, डेथ ओवरों की कमजोर गेंदबाजी और बड़े मैचों में दबाव नहीं झेल पाने जैसी कमियों ने सेमीफाइनल की उम्मीदें तोड़ दीं।
भारतीय महिला क्रिकेट टीम का टी20 विश्वकप में सफर खत्म हो गया। रविवार को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ग्रुप स्टेज में हार ने भारत के सफर को रोक दिया। टीम सेमीफाइनल में नहीं पहुंच पाई। महिला टी20 विश्वकप के सेमीफाइनल में पहुंचने वाली चार टीमें ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड और वेस्टइंडीज रहीं। अब टीम इंडिया की हार के बाद फैंस सोशल मीडिया पर लगातार सवाल खड़े कर रहे हैं। खासतौर पर पिछले साल वनडे विश्वकप जीतने के बाद टीम इंडिया से काफी उम्मीदें थीं।
भारतीय महिला टीम के पास अनुभवी बल्लेबाज, विश्व स्तरीय स्पिन आक्रमण और बड़े मंच का अनुभव था, लेकिन आधुनिक टी20 क्रिकेट की सबसे अहम जरूरतें, आक्रामक रणनीति, प्रभावी तेज गेंदबाजी, दमदार फील्डिंग और दबाव में सही फैसले, पूरे टूर्नामेंट में कमजोर साबित हुईं। यही कारण रहा कि भारत अच्छी शुरुआत और कुछ जीत के बावजूद सेमीफाइनल तक नहीं पहुंच सका।
1. बड़े मुकाबलों में रणनीति ही उलटी पड़ गई
कोच अमोल मजूमदार और कप्तान हरमनप्रीत कौर दोनों ने स्वीकार किया कि टीम को अपनी टी20 रणनीति पर दोबारा विचार करना होगा। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ करो या मरो मुकाबले में भारत ने पहले बल्लेबाजी का फैसला किया, जबकि उसी पिच पर रन बनाना आसान नहीं था। 170 रन को टीम ने पर्याप्त माना, लेकिन इससे ऑस्ट्रेलिया को लक्ष्य का स्पष्ट अंदाजा मिल गया। दूसरी ओर भारतीय गेंदबाजों पर अतिरिक्त दबाव आ गया कि वे मजबूत ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजी के खिलाफ इस स्कोर का बचाव करें। अनुभवी बल्लेबाजी क्रम पर दबाव कम करने की कोशिश आखिरकार टीम के खिलाफ चली गई।
2. तेज गेंदबाजी पूरे टूर्नामेंट में सबसे कमजोर कड़ी साबित हुई
स्पिनरों ने लगातार विकेट निकाले, लेकिन तेज गेंदबाज लगभग बेअसर रहे। पूरे टूर्नामेंट में भारत के पेस अटैक ने सबसे कम सिर्फ 2 विकेट लिए। उनका गेंदबाजी औसत 64.50, स्ट्राइक रेट 45.5 और इकॉनमी 8.50 रही, जो प्रतियोगिता में सबसे खराब आंकड़ों में शामिल रही। भारतीय तेज गेंदबाज शुरुआती विकेट नहीं निकाल सके और न ही बल्लेबाजों पर दबाव बना पाए। इससे स्पिनरों पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता बढ़ गई।
3. फील्डिंग ने बार-बार मेहनत पर पानी फेर दिया
भारत की फील्डिंग पूरे टूर्नामेंट में चिंता का विषय रही। बांग्लादेश के खिलाफ सिर्फ 12 गेंदों के भीतर चार कैच छूटे। पाकिस्तान के खिलाफ भी तीन मौके गंवाए गए। 2025 के बाद भारत ने 25 टी20 अंतरराष्ट्रीय मैचों में 46 कैच छोड़े, जो इस अवधि में किसी भी टीम से सबसे ज्यादा हैं। टीम की कैचिंग एफिशिएंसी केवल 69.3 प्रतिशत रही। कप्तान हरमनप्रीत कौर भी मान चुकी हैं कि बड़े मुकाबलों में ऐसी गलतियां मैच का रुख बदल देती हैं।
4. बल्लेबाजी में सही समय पर सही फैसले नहीं हुए
भारत का बल्लेबाजी क्रम पूरे टूर्नामेंट में स्थिर नहीं दिखा। अलग-अलग मैचों में मध्यक्रम की बल्लेबाजी क्रम बदलती रही। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ जेमिमा रोड्रिग्स लंबे समय तक संघर्ष करती रहीं, लेकिन उन्हें काफी देर से रिटायर्ड आउट किया गया। तब तक सिर्फ कुछ ओवर बचे थे और विस्फोटक बल्लेबाज ऋचा घोष को केवल एक गेंद खेलने का मौका मिला। टीम की आक्रामक बल्लेबाजी की रणनीति बड़े मैच में डिफेंसिव सोच में बदल गई।
5. डेथ ओवरों में गेंदबाजी और बल्लेबाजी दोनों फेल
भारतीय टीम पूरे टूर्नामेंट में आखिरी ओवरों में दबाव झेलने में असफल रही। गेंदबाजी में डेथ ओवरों में लगातार बड़े रन दिए गए, जबकि बल्लेबाजी में लक्ष्य का पीछा करते समय जरूरी रन गति हासिल नहीं हो सकी। हरमनप्रीत कौर ने भी स्वीकार किया कि लंबे समय से यही समस्या बनी हुई है कि टीम मैच में रहते हुए भी अंतिम ओवरों में मुकाबला गंवा देती है।
6. सही प्लेइंग-11 नहीं मिल पाया
विश्वकप के दौरान भारत लगातार अपने सही संयोजन की तलाश में रहा। पांच मैचों में तेज गेंदबाजों के अलग-अलग कॉम्बिनेशन आजमाए गए। श्रेयंका पाटिल की चोट के बाद डेथ ओवरों में विकल्प नहीं मिला। कोच अमोल मजूमदार ने भी माना कि टीम अब तक तय नहीं कर सकी कि उसका सर्वश्रेष्ठ टी20 संयोजन क्या है। यही असमंजस पूरे अभियान में दिखाई दिया।
जिन दो मैचों का डर था, उन्हीं में हारे
सारे एनालिसिस के बाद भारतीय टीम की हार का सबसे बड़ा निष्कर्ष यही रहा कि टूर्नामेंट शुरू होने से पहले जिन दो बड़े मुकाबलों को सबसे अहम माना जा रहा था, आखिरकार वही टीम की किस्मत तय कर गए।
दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मुकाबला ऐसा था, जिसमें जो टीम उस दिन बेहतर खेलती, उसके सेमीफाइनल में पहुंचने की संभावना सबसे ज्यादा थी और हुआ भी बिल्कुल यही।
भारत ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और नीदरलैंड जैसी टीमों के खिलाफ जीत जरूर दर्ज की, लेकिन उससे कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि असली परीक्षा दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ थी।
एक दिन के अच्छे खेल से चमकी द. अफ्रीका की किस्मत
दिलचस्प बात यह भी रही कि दक्षिण अफ्रीका का अभियान भी डगमगाता रहा है। टीम पाकिस्तान और बांग्लादेश के खिलाफ संघर्ष करती नजर आई और ग्रुप चरण के अंत तक उसे अपनी उम्मीदों के लिए ऑस्ट्रेलिया के नतीजों पर भी निर्भर रहना पड़ा। इसके बावजूद ग्रुप-ए का फैसला उस टीम के पक्ष में गया, जिसने 21 जून को कम गलतियां कीं। भारत के लिए छूटी हुई कैच सबसे महंगी साबित हुईं। फील्डिंग में हुई चूकों का दक्षिण अफ्रीका ने पूरा फायदा उठाया। मारीजाने कैप की शानदार पारी ने मैच का रुख बदल दिया और आखिरकार दक्षिण अफ्रीका बेहतर टीम साबित हुई।
