
समुद्र मंथन योजना क्या है? सरकार जो 84 हजार करोड़ रुपये पेट्रोलियम मंत्रालय को दे रही है, उसके जरिए क्या किया जाएगा? इस योजना की नींव कब-कैसे और क्यों पड़ी? कैसे भारत इस योजना के जरिए विदेश से होने वाले तेल-गैस आयात को कम कर सकता है? मौजूदा समय में भारत समुद्र की गहराईयों से तेल-गैस खोजने की परियोजना में कहां ठहरता है?
केंद्रीय कैबिनेट ने हाल ही में भारत की समुद्र मंथन योजना के लिए 84 हजार 84 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। देशभर के विशेषज्ञ इसे भारत की उस दूरगामी योजना का हिस्सा करार दे रहे हैं, जिसके जरिए तेल-गैस की आपूर्ति के लिए सरकार विदेश पर निर्भरता घटा सकती है। पेट्रोलियम मंत्रालय को समुद्र की गहराईयों में स्थित तेल-गैस के भंडारों को खोजने के लिए दिए जाने वाले इस फंड के जरिए सरकार अब तक कुछ हद तक अनछुए और जोखिम भरे डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन को बढ़ावा देने पर विचार कर रही है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह समुद्र मंथन योजना क्या है? सरकार जो 84 हजार करोड़ रुपये पेट्रोलियम मंत्रालय को दे रही है, उसके जरिए क्या किया जाएगा? इस योजना की नींव कब-कैसे और क्यों पड़ी? मौजूदा समय में भारत समुद्र की गहराईयों से तेल-गैस खोजने की परियोजना में कहां ठहरता है?
पहले जानें- क्या है समुद्र मंथन योजना?
सरकार की समुद्र मंथन योजना, जिसे डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन मिशन मिशन या राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना भी कहा जा रहा है। भारत सरकार की एक महत्वाकांक्षी रणनीतिक पहल है। इसका मकसद गहरे समुद्र के नीचे छिपे कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और महत्वपूर्ण खनिजों के भंडार का पता लगाना और उनका उत्पादन करना है।
84,084 करोड़ के फंड से क्या किया जाएगा?
31 जुलाई 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस योजना के लिए 84,084 करोड़ रुपये के भारी-भरकम निवेश को मंजूरी दी है, जिसका इस्तेमाल वित्तीय वर्ष 2030-31 तक किया जाना तय हुआ है।
हाइड्रोकार्बन यानी तेल-गैस को जमीन के नीचे खोजना अपने आप में एक जटिल, ज्यादा खर्चीला और समय लेने वाला काम है। आमतौर पर इसमें पांच से 10 साल का समय तक लग सकता है। वह भी उन जगहों पर जहां पहले से ही खनन के लिए ब्लॉक का आवंटन किया जा चुका हो।
दूसरी तरफ डीपवॉटर यानी समुद्र की गहराईयों में तेल-गैस की खोज आम भूमि से तेल-गैस खोजने के मुकाबले में और भी मुश्किल है। इसकी वजह यह है कि पानी की गहराइयों में उतरना कठिन है और इसके लिए ज्यादा आधुनिक तकनीक-निवेश की जरूरत पड़ती है।
पेट्रोलियम मंत्रालय ने भारत में समुद्री क्षेत्र में तेल-गैस मिलने की संभावना जताई है। खासकर कृष्णा-गोदावरी, कावेरी, महानदी जैसे बेसिन और अंडमान में समुद्री क्षेत्र के करीब। इन्हीं क्षेत्रों में सरकार आने वाले समय में तेल-गैस के कुएं खोजने पर काम कर सकती है।
सरकार के अनुमानों के मुताबिक, समुद्र की गहराई में ऐसे किसी भी तेल-गैस के भंडार खोजने और इन्हें कुएं के तौर पर विकसित करने में 1200 करोड़ से 1500 करोड़ रुपये (125 मिलियन डॉलर से 150 मिलियन डॉलर) तक का खर्च आ सकता है।
इस पूरे मिशन की एक खास बात यह है कि तेल-गैस भंडार को खोजना अपने आप में संभावनाओं का खेल है। यानी ऐसी परियोजनाएं जोखिम भरी और महंगी होती हैं, जिसकी वजह से निजी कंपनियां इससे दूर रहती हैं। यही वजह है कि केंद्र सरकार अब खुद इसके लिए आगे आई है।
केंद्र की ओर से जारी बयान के मुताबिक, समुद्र के अंदर तेल-गैस के भंडार खोजने के जोखिम और खर्च को देखते हुए सरकार खुद ही सतत निवेश को बढ़ावा दे रही है, ताकि भारत को तटीय क्षेत्र में छिपे ईंधन और खनिज संसाधनों का फायदा उठाने में मदद मिले।
कहां-कैसे खर्च होगी परियोजना की रकम?
समुद्र तल के नीचे तेल और गैस के सटीक स्थानों की मैपिंग के लिए 28,534 करोड़ रुपये आवंटित।
खोजी गई गैस और तेल के व्यावसायीकरण के लिए बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 10,000 करोड़ रु. तय।
घरेलू विनिर्माण और अहम उपकरणों को देश में बनाने की योजना के लिए 2,000 करोड़ का प्रावधान।
तेल-गैस निकालने के लिए 60 गहरे पानी के कुओं की खुदाई होगी। इसके लिए 43,200 करोड़ रु. तय।
सरकार जोखिम कम करने के लिए हर कुएं 50% लागत या 675 करोड़ रुपये तक साझा करेगी।
क्यों और कैसे बनी भारत के तटीय क्षेत्र से तेल-गैस निकालने की योजना?
भारत के तटीय और गहरे समुद्री क्षेत्रों से तेल-गैस निकालने की समुद्र मंथन योजना की नींव मुख्य रूप से देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और बाहरी भू-राजनीतिक झटकों से अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए रखी गई। हालांकि, अमेरिका-ईरान युद्ध से होर्मुज जलडमरूमध्य के बाधित होने और रूस से भारत की तेल खरीद पर अमेरिकी संसद के संभावित कड़े फैसले को देखते हुए सरकार ने इस योजना को तेजी से मंजूरी दी है।
पिछले साल 15 अगस्त को हुआ था पहला एलान
नेशनल डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन मिशन का पहला एलान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2025 को अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में की थी। तब पीएम ने कहा था कि सरकार अब देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए काम कर रही है।
तब पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बताया था कि पिछले पांच वर्षों में डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन के लिए 52 खोजें हुई हैं और 2014 के बाद से अब तक कुल 172 खोजें हुई हैं, जिनमें 66 ऑफशोर (समुद्र के तटीय क्षेत्र) शामिल हैं। अन्वेषण के लिए 3.8 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र आवंटित किया गया है, जबकि 2009 से 2014 के बीच यह आंकड़ा 82,327 वर्ग किलोमीटर था।
उन्होंने बताया था कि लगभग 10 लाख वर्ग किलोमीटर के ‘नो-गो’ क्षेत्रों को अन्वेषण के लिए खोलकर नीलामी के लिए खोले गए हैं। इनमें अंडमान-निकोबार बेसिन जैसे नए गहरे पानी के फ्रंटियर शामिल हैं। अंडमान समुद्र, खासकर आंध्र तट और अंडमान सागर के गहरे पानी वाले क्षेत्र, संभावनाओं से भरे हो सकते हैं।
