
अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने भारत पर टैरिफ मामले में बड़ा खुलासा किया है। बेसेंट ने रविवार को बताया कि अमेरिका ने रूस से ऊर्जा खरीदने के मामले में भारत और चीन पर ‘सेकेंडरी टैरिफ’ लगाने के लिए यूरोपीय देशों से समर्थन मांगा था, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। हालांकि बेसेंट ने मॉस्को के साथ व्यापार करने वाले देशों पर नए प्रतिबंधों को लागू करने से रोकने के वाशिंगटन के फैसले का बचाव किया। वहीं अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने कहा कि भारत और चीन ऐसे दो मुख्य देश हैं, जिन पर नए प्रतिबंध कानून के तहत जुर्माना लग सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास बाद में इन प्रतिबंधों को लागू करने का अधिकार सुरक्षित है।
एनबीसी के ‘मीट द प्रेस’ कार्यक्रम में बेसेंट ने बताया कि यूरोपीय देश रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदते रहे हैं और भारत-चीन के खिलाफ वाशिंगटन की प्रस्तावित कार्रवाई में शामिल होने से इनकार कर दिया। बेसेंट ने कहा, ‘हमने कुछ महीने पहले अपने यूरोपीय सहयोगियों से कहा था कि वे चीन और भारत पर सेकेंडरी टैरिफ लगाने में हमारा साथ दें। उन्होंने मना कर दिया।’ उन्होंने सवाल किया, ‘तो फिर अमेरिका ही यह बोझ क्यों उठाए?’
यूरोप पर क्या आरोप लगाया?
बेसेंट ने यूरोपीय सरकारों पर आरोप लगाया कि वे ऊर्जा खरीद के जरिए रूस को लगातार आर्थिक मदद (फंडिंग) दे रही हैं। उन्होंने ‘यमल’ फैसिलिटी से होने वाले शिपमेंट का हवाला दिया और कहा कि साल के पहले छह महीनों में वहां से 140 कार्गो भेजे गए, जिनमें से 136 यूरोपीय देशों में गए। उन्होंने बताया कि आठ अरब डॉलर से अधिक मूल्य के ये शिपमेंट बेल्जियम, स्पेन, फ्रांस और नीदरलैंड जैसे देशों में भेजे गए। ट्रेजरी सेक्रेटरी ने तर्क दिया कि अगर सहयोगी देश कोई ठोस कदम नहीं उठा रहे हैं, तो प्रशासन को अपनी प्रतिबंध रणनीति पर फिर से विचार करने का पूरा अधिकार है। उन्होंने कहा कि कानून के तहत स्थिति की समीक्षा के लिए 60 दिन का समय दिया गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि रूस की प्रमुख ऊर्जा कंपनियों पर पहले से लागू प्रतिबंध अभी भी बरकरार हैं। बेसेंट ने स्पष्ट किया कि कोई भी प्रतिबंध नहीं हटाया गया है। उन्होंने नए दंड को रोकने के फैसले को, रूसी डीजल निर्यात पर पाबंदियों में ढील देने के फैसले से अलग बताया।
रूस पर क्या बोले ऊर्जा सचिव?
सीएनएन के ‘स्टेट ऑफ द यूनियन’ कार्यक्रम में बोलते हुए, राइट ने रूस को सीधे तौर पर निशाना बनाने वाले प्रतिबंधों और मॉस्को के साथ व्यापार जारी रखने वाले देशों के खिलाफ लगाए जाने वाले दंडों के बीच का अंतर स्पष्ट किया। राइट ने कहा कि लिंडसे ग्राहम एक्ट रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने के बारे में नहीं है। यह उन देशों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने के बारे में है जो रूस के साथ व्यापार करते हैं। उन्होंने आगे कहा, ‘इनमें से दो देश काफी अहम हैं- चीन और भारत।’ राइट ने बताया कि वाशिंगटन, बीजिंग के साथ यूक्रेन संघर्ष और दीर्घकालिक व्यापार संबंधों पर चर्चा कर रहा है। राइट ने कहा कि उन्होंने लिंडसे ग्राहम प्रतिबंधों को खत्म नहीं किया है। उन्होंने फिलहाल बस इनके लागू होने की प्रक्रिया को रोक दिया है। ऊर्जा सचिव ने डीजल से जुड़े इस कदम का बचाव करते हुए तर्क दिया कि रूस को तभी फायदा हो सकता है, जब वह अपने सैन्य अभियानों को इतना कम कर दे कि निर्यात के लिए अतिरिक्त ईंधन उपलब्ध हो सके।
उन्होंने कहा कि रूसी कच्चे तेल पर पहले से लगे प्रतिबंध बरकरार हैं और डीजल से जुड़ा यह कदम संघर्ष को खत्म करने की दिशा में प्रगति को बढ़ावा देने के लिए उठाया गया है। बेसेंट ने प्रशासन के व्यापक प्रतिबंधों के रिकॉर्ड का बचाव किया। उन्होंने इस दावे को भी खारिज कर दिया कि वाशिंगटन यूक्रेन का साथ छोड़ रहा है; उन्होंने इस बात की ओर इशारा किया कि यूक्रेन को लगातार खुफिया जानकारी दी जा रही है और नाटो सहयोगियों के जरिए अमेरिकी हथियार भी पहुंचाए जा रहे हैं।
