
Kanpur News: कानपुर किडनी रैकेट का मास्टरमाइंड शिवम और मेरठ का डॉ. अफजाल डायलिसिस सेंटरों से रईस मरीजों की तलाश करते थे। आहूजा हॉस्पिटल में आधी रात को सीसीटीवी बंद कर और स्टाफ को हटाकर अवैध सर्जरी की जाती थी।
कानपुर में मसवानपुर चौराहा स्थित आहूजा हॉस्पिटल में किडनी ट्रांसप्लांट देर रात या सुबह के तीन से चार बजे के बीच होता था। यह वह समय था जब अधिकतर मरीज व तीमारदार नींद में होते थे। सर्जरी के बाद किडनी रोगी व डोनर को शिफ्ट करना आसान रहता था। किडनी प्रत्यारोपण वाले दिन पूरे स्टाफ को छुट्टी दे दी जाती थी।
यह जानकारी पुलिस और सीएमओ कार्यालय के अधिकारियों को जांच में मिली है। पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने बताया कि आहूजा हॉस्पिटल में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए देर रात का समय निर्धारित किया जाता था। इस दौरान सभी स्टाफ की छुट्टी कर दी जाती थी। केवल मेरठ और नोएडा के डॉक्टरों व पैरामेडिकल टीम रहती थी।
सीसीटीवी कैमरे भी बंद कर दिए जाते थे
इसके बाद अनधिकृत तरीके से अंग प्रत्यारोपण का खेल चलता था। सर्जरी के बाद किडनी रोगी और डोनर को अलग-अलग अस्पताल में भर्ती करा दिया जाता था। इस बीच अस्पताल के सीसीटीवी कैमरे भी बंद कर दिए जाते थे। पुलिस और सीएमओ कार्यालय की टीम को आरोपियों की वीडियो फुटेज नहीं मिली है।
एंबुलेंस व मरीज को शिफ्ट कराने की फुटेज मिले
आहूजा हॉस्पिटल, मेडलाइफ और प्रिया नर्सिंगहोम में भी फुटेज नहीं मिले हैं। हालांकि आसपास लगे अन्य सीसीटीवी कैमरों ने एंबुलेंस व मरीज को शिफ्ट कराने की फुटेज मिले हैं। पुलिस ने साक्ष्य बरामद किए हैं। हालांकि, अस्पताल के रिकार्ड में भी किसी तरह की सर्जरी का ब्योरा नहीं मिला है।
अनाधिकृत पैरामेडिकल स्टाफ कर रहा था इलाज
सीएमओ की जांच में सामने आया है कि मेडलाइफ और प्रिया नर्सिंगहोम में अनाधिकृत पैरामेडिकल स्टाफ इलाज कर रहा था। उनको सादे कागज में सिर्फ पांच दिन दवाएं, इंजेक्शन, ग्लूकोज आदि की डिटेल लिखी गई थी। यह प्रक्रिया अन्य गुर्द रोगियों और डोनर में अपनाई जाती थी। अगर कोई भी केस बिगड़ता तो सिर्फ लखनऊ के एक नर्सिंगहोम में रेफर कर दिया जाता था।
डायलिसिस कराने वाले मरीजों की पता करते थे हैसियत
कानपुर किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट से जुड़े आरोपी हमेशा उन लोगों की तलाश करते जिन्हें या तो रुपयों की सख्त हो या फिर किडनी की। रुपये के जरूरतमंदों की जानकारी के लिए नौकरी पेशा लोग या छात्रों को निशाना बनाया जाता। वहीं, किडनी किसकी खराब है और कितनी खराब है इसके बारे में उन अस्पतालों से जानकारी जुटाई जाती।
मेरठ के डॉ. अफजाल की पुलिस कर रही तलाश
जहां लोग डायलिसिस कराने जाते हैं वहीं से मरीजों का पता लेकर आरोपी उनके बारे में पूरी जानकारी जुटाते थे। उनकी हैसियत देखकर उनसे किडनी के लिए संपर्क करते थे। मामले का खुलासा करते हुए पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने बताया कि पूरा सिंडिकेट ऑर्गनाइज तरीके से काम करता था। मेरठ का रहने वाला डॉ. अफजल डायलिसिस करने वाले अस्पतालों से संपर्क रखता था।
आठ साल से डायलिसिस करने वाली पारुल से तय किया था सौदा
वहां से मरीजों की जानकारी लेकर उनसे किडनी ट्रांसप्लांट कराने के लिए संपर्क करता था। इसके बाद आरोपी टेलीग्राम पर बने ग्रुप में मरीज की जानकारी साझा कर किडनी की डिमांड करते थे। इसी डॉक्टर अफजाल ने मेरठ के बड़े स्कूल संचालक की पत्नी पारुल तोमर से संपर्क किया था। पारुल की दोनों किडनी खराब हैं। उसका ब्लड ग्रुप बी-पॉजिटिव है।
मास्टरमाइंड की भूमिका में नजर आ रहा है शिवम
वह बीते आठ वर्षों से नियमित डायलिसिस करा रही हैं। ऐसे में किडनी मिलने की उम्मीद पर वह ट्रांसप्लांट के लिए राजी हो गई थीं। शिवम अब तक मास्टर माइंड की भूमिका में नजर आ रहा है। वहीं, ट्रांसप्लांट करने वाले डॉ. रोहित से संपर्क करता था। डॉ. रोहित नोएडा और लखनऊ से अपनी टीम लेकर शहर आते थे जिनमें एनेस्थीसिया देने वाले डॉक्टर, सर्जन आदि शामिल रहते थे।
