
राजधानी दिल्ली ने भारतीय फुटबॉल को कई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी दिए हैं, लेकिन स्टेडियम खराब सुविधाएं, प्रदूषण और मौसम संबंधी चुनौतियों के कारण 2005 के बाद से यहां बड़े फुटबॉल टूर्नामेंट नियमित रूप से आयोजित नहीं हो पाए हैं।
राष्ट्रीय एथलीट डे के अवसर पर जब देश खेल प्रतिभाओं का जश्न मना रहा है, तब दिल्ली का फुटबॉल ढांचा एक जटिल तस्वीर पेश करता है। जहां एक ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी लगातार निकल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राजधानी बड़े फुटबॉल आयोजनों की मेजबानी से लगभग दो दशकों से दूर है।
दिल्ली ने भारतीय फुटबॉल को सुनील छेत्री, संदेश झींगा और गुरप्रीत सिंह संधु जैसे खिलाड़ी दिए, जिन्होंने वैश्विक मंच पर देश का प्रतिनिधित्व किया। इसके बावजूद 2005 के बाद से राजधानी में बड़े राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल टूर्नामेंट नियमित रूप से आयोजित नहीं हो पाए।
विशेषज्ञ इसे इंफ्रास्ट्रक्चर-परफॉर्मेंस गैप के रूप में देखते हैं जहां टैलेंट तो मौजूद है, लेकिन उसे सपोर्ट करने वाला सिस्टम कमजोर है। ऐतिहासिक रूप से अम्बेडकर स्टेडियम और जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम दिल्ली के फुटबॉल इकोसिस्टम के केंद्र रहे हैं।
हालांकि, वर्तमान में इन स्टेडियमों की स्थिति अंतरराष्ट्रीय मानकों से पीछे मानी जाती है। खेल प्रबंधन से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, पिच क्वालिटी, ड्रेनेज सिस्टम, खिलाड़ियों के लिए रिकवरी सुविधाएं और दर्शकों के लिए बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे कई पहलुओं में सुधार की आवश्यकता है। पर्यावरणीय कारक भी एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरते हैं। दिल्ली की गर्मियों में उच्च तापमान और सर्दियों में बढ़ता वायु प्रदूषण खिलाड़ियों के प्रदर्शन, फिटनेस और मैच आयोजन की व्यवहार्यता को प्रभावित करता है। यही कारण है कि कई राष्ट्रीय स्तर के आयोजनों के लिए आयोजक वैकल्पिक शहरों को प्राथमिकता देने लगे हैं।
राजधानी के मैदानों पर लगातार स्थानीय प्रतियोगिताएं जैसे डीपीएल, आई -लीग सेकेंड डिवीजन आयोजित होती रहती हैं। इससे ग्राउंड की उपलब्धता और मेंटेनेंस दोनों पर दबाव पड़ता है। 2010 के कॉमनवेल्थ गैम्स के दौरान विकसित स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर से उम्मीद थी कि दिल्ली अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल हब के रूप में उभरेगी, लेकिन फुटबॉल के संदर्भ में इन संसाधनों का सीमित उपयोग ही हो पाया। दिल्ली सॉकर एसोसिएशन संचालन समन्वयक राहुल कुमार ने बताया कि शहर के बाहरी क्षेत्रों जैसे द्वारका के चावला स्थित नए फुटबॉल ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार का हिस्सा हैं, लेकिन वहां तक पहुंच एक बड़ी समस्या बनी हुई है। मेट्रो कनेक्टिविटी की दूरी और लोकल ट्रांसपोर्ट की कमी खिलाड़ियों और दर्शकों दोनों के लिए बाधा बनती है।
उनका सुझाव है कि नेचुरल ग्रास पिच, बेहतर कूलिंग सिस्टम और आधुनिक स्टेडियम सुविधाओं को अपनाने से दिल्ली के फुटबॉल ग्राउंड्स की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है। हालांकि, नेचुरल ग्रास के रखरखाव में अधिक लागत और विशेषज्ञता की जरूरत होती है, जो दीर्घकालिक निवेश की मांग
करता है।
