
फुटपाथ पर कपड़े-लत्ते, सब्जी-भाजी और पान-बीड़ी से लेकर दुकान में वस्तुओं की बिक्री से मुनाफा कमाया जाता है। उस मुनाफे पर व्यापार-धंधा करने वाले तमाम लोग सरकार को आयकर भुगतान करते हैं। इनमें कुछ लोग कम, तो कुछ लोग अधिक आयकर भुगतान करते हैं। जो जितना कम या अधिक कमाता हैं वह उतना ही कम-ज़्यादा आयकर भी देता हैं। यह तो हम सब जानते ही हैं लेकिन यह बहुत कम लोग जानते हैं कि एक ज़्यादा कमाने वाला व्यापारी कम आयकर देकर भी धनवान कैसे बन सकता हैं।
आइए जानते हैं कि यह कैसे होता है, साधारणतया इनकम निकालने का गणित ऐसे ही होता है कि पांच रुपए की वस्तु दस रुपए में बेची जाए तो पांच रुपया मुनाफा माना जाता हैं। हालांकि, पांच रुपए की वस्तु पर ट्रांसपोर्ट, हमाली, किराया, पोस्टेज आदि खर्च को निकालने के बाद शेष मुनाफे को नेट प्रॉफिट माना जाता हैं और उस नेट प्रॉफिट पर आयकर चुकाना पड़ता हैं। नेट प्रॉफिट पर आयकर चुकाने के बाद आप इसे इसी वर्ष में ही घर में खर्च कर लेते हैं या फिर इसे कहीं जमाकर अगले दस-बीस साल में खर्च करते हैं। क्या इसे आप अपने व्यापार-धंधे से कमाया हुआ मुनाफ़ा मानते हैं? आयकर विवरणिका के अनुसार तो यह मुनाफा ही माना जाएगा, लेकिन क्या आपके कारोबार-प्रगति के अनुसार इसे मुनाफ़ा माना जाएगा, शायद नहीं। फिर क्या करना चाहिए, जिससे कम से कम आयकर देकर भी अधिकतम मुनाफे के साथ व्यापार-व्यवसाय के साथ आपकी निजी वेल्थ बढ़ती जाए?

Bharatkumar Solankiकोई भी व्यवसाय-विक्रेता अपने कमाए पैसों को ऐसी एसेट में निवेश करें, जिस पर एक बार इनकम टैक्स देने के बाद फिर से दोबारा कभी आयकर न देना पड़े। इसमें पीपीएफ, जीवन बीमा, इक्विटी म्यूच्यूअल फंड आदि योजनाओं में अगर आप नियमित निवेश करते रहे तो इससे होने वाली आमदनी से टैक्स फ्री इनकम मिलती रहेगी। हां, इन टैक्स फ्री योजनाओं में एक सीमा जरुर होती है, लेकिन इन सीमाओं के अधीन बिना आयकर भुगतान अधिकतम आय को करमुक्त किया जा सकता है। इसके अलावा सोना-चांदी, प्रॉपर्टी या इक्विटी निवेश को लेकर कभी इसे बेचे ही नहीं, हां सिर्फ ख़रीद को कम-ज़्यादा कर उसे संतुलित जरुर करें।
व्यापार-व्यवसायवालों की आमदनी तो हमेशा चालू ही रहती हैं फिर इन दीर्घकालीन निवेश योजनाओं से पैसा क्यों निकाला जाए, आप जब तक इन निवेश योजनाओं से पैसे निकालते नहीं हैं, तब तक आपको उस पर होने वाले मुनाफे पर एक रुपया भी इनकम टैक्स नहीं देना है तो फिर आप उनमें से पैसे निकालते क्यों हैं?
प्रॉपरायटरशिप से पब्लिक लिमिटेड तक का सफर तय करने वाले विशेष लोगों की खास विशेषता भी यही होती हैं कि वे डबल टैक्सेशन से बचने की कोशिश आजीवन करते रहते हैं। टैक्स तो हर कोई भरता है, लेकिन अपनी एसेट बनाकर एक ही बार टैक्स भरता है तो उसके जीवन में उसकी व्यावसायिक जीत निश्चित ही होती है, लेकिन जो एसेट नहीं बनाते हुए भी जीवन भर टैक्स भरते रहते हैं वैसे लोग एक दिन जिंदगी की रेस में आखिर हार ही जाते हैं।
(लेखक आर्थिक निवेश मामलों के विशेषज्ञ हैं)
